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जीवन के आद्यात्मिक रुपांतरण के लिए चित्त भी होना चाहिए आद्यात्मिक : स्वामी दिव्यानंद

जीवन के आद्यात्मिक रुपांतरण के लिए चित्त भी होना चाहिए आद्यात्मिक : स्वामी दिव्यानंद
गुडग़ांव, 20 दिसम्बर (अशोक): जीवन को परिवर्तित करने के लिए आद्यात्मिक क्रियाएं ही पर्याप्त नहीं हैं, इसके लिए आद्यात्मिक चित्त भी होना
चाहिए। परमार्थ साधना के लिए मन की वृति का ही महत्व है। उक्त उद्गार सामाजिक संस्था श्रीगीता साधना सेवा समिति द्वारा श्रीगीता जयंती के
उपलक्ष्य में ज्योति पार्क स्थित श्रीगीता आश्रम में आयोजित 4 दिवसीय दिव्य गीता प्रवचन माला का शुक्रवार को तपोवन हरिद्वार के गीता ज्ञानेश्वर डा. स्वामी दिव्यानंद महाराज ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जीवन के आद्यात्मिक रुपांतरण के लिए मनुष्य का चित्त भी आद्यात्मिक होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के माध्यम से उपदेश दिया था कि हे, अर्जुन यदि तुम आद्यात्म चित्त वाला होकर नियत कर्म करोगे तो कोई भी कर्म तुम्हारी मन, बुद्धि को विक्षेप के ज्वर से विक्षिप्त नहीं होने देगा। महाराज जी ने कहा कि केवल कर्म ही नहीं, अपितु कर्म करने वाले को भी अपनी गुणवत्ता सुधारनी पड़ेगी। अन्यथा यह भी सत्य है कि कर्म किए बिना कोई क्षण मात्र भी नहीं सकता। महाराज जी ने अपने प्रवचनों में कहा कि गीता में उपदेश की यही विशेषता है जैसे दर्पण के सामने स्वयं का रुप दिखाई देता है। उन्होंने अपने प्रवचनों में कहा कि बाहर के कर्मकांड से ऊपर उठकर गीता में दिए गए उपदेशों को अपने भीतर आत्मसात करें। संस्था के प्रबंधक राजेश गाबा कार्यक्रम का शुभारंभ समाजसेवी हरविंद्र कोहली ने दीप प्रज्जवलित कर किया और आद्यात्मिक जन्मोत्सव भी मनाया। इस अवसर पर समाजसेवी अश्विनी मलिक व गायत्री मलिक ने ग्रंथ पूजन भी किया। प्रवचनों का रसस्वादन करने के लिए बड़ी संख्या में महिला, पुरुष व बच्चे भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

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