चले सनातन की ओर

श्रीकृष्ण – शरीर की नित्यता

श्रीकृष्ण – शरीर की नित्यता

हे विदुर ! एक बार भगवान प्रभासक्षेत्र में मुनियों के दर्शन करने गए अथवा यों कहना चाहिए कि मुनियों ने उनसे उनकी कुशल पूछी,
इस पर सनत्कुमार कहते लगे –

सनत्कुमार – हे मुनियों ! तप का शाश्वत फल चाहनेवाले आपको कल्याण हो, , श्रीकृष्ण तो कल्याण के बीज ही हैं, उनसे कुशल – प्रश्न करना व्यर्थ है । इस समय परमात्मा के दर्शन से आपका कुशल है, भगवान तो प्रकृति से पर देहवाले हैं, निर्गुण हैं, निरीह हैं, सबके बीज हैं , चित्त – स्वरूप हैं, पृथ्वी का भार उतारने के लिए इस समय आविर्भूत हुए हैं, इसलिए उनसे कुशल पूछना निरर्थक ही है ।

सनत्कुमार के ये वचन सुनकर भक्तभावन भगवान मुनियों का अनादर न सह सके और उनका पक्ष लेकर इस प्रकार कहने लगे –

श्रीकृष्ण – हे विप्र ! शरीरधारियों की कुशल पूछना ठीक ही है, फिर मुनियों का मुझसे कुशल – प्रश्न करना क्यों नहीं बनता ?

सनत्कुमार – हे नाथ ! प्राकृत – शरीर में शुभ – अशुभ सर्वदा होते हैं, क्षेम के बीजरूप नित्य देह में कुशल – प्रश्न निरर्थक है ।

श्रीकृष्ण – हे विप्र ! जो देहधारी है, वह प्राकृतिक ही समझा जाता है, उस नित्य प्रकृति के बिना कोई देह विद्यमान नहीं हैं ।

सनत्कुमार – हे प्रभो ! रक्त और विंदु से उत्पन्न हुए देह प्राकृतिक समझे जाते हैं, सबके बीज प्रकृति नाथ का शरीर प्राकृत कभी नहीं हो सकता । आप सबके बीज, सबके आदि, स्वयं भगवान हैं, सब अवतारों में प्रधान हैं, अव्यय बीज हैं । हे प्रभो ! परम परमात्मा, ज्योतिस्वरूप, ईश्वर को वेद नित्य नित्य और सनातन कहते हैं । परम निर्गुण माया के ईश्वर को वेदांत और वेदवेत्ता माया करके सगुण कहते हैं ।

श्रीकृष्ण – इस समय तो मैं भक्त – वीर्य के आश्रित शरीर वाला वासुदेव हूं, हे विप्र ! प्राकृत में कुशल – प्रश्न क्यों नहीं बनता ?

सनत्कुमार – नहीं, जिसके रोमों में विश्व – ब्रह्मांड भरे हैं, जो सर्वत्र बसा हुआ है और जो सर्वदा निवास हैं, उस परब्रह्म देव का नाम वासुदेव है, ऐसा चारों वेदों में, पुराणों में, इतिहासों में और प्रस्थानों में देखने में आता है । समस्त वेद में रक्त – वीर्य के आश्रित देह – निरुपण किया है । मेरे इस वचन के इस समय मुनि साक्षी हैं । वेद, सूर्य और चंद्र भी साक्षी हैं, क्योंकि धर्म सर्वत्र ही है

भगवत् – कृपापात्र भक्त भगवान के कहने पर भी भगवत्स्वरूप को नहीं भूलते और उनके शरीर को पाञ्चभौतिक नहीं मानकर, नित्य ही मानते हैं । हे विदुर ! अपनी माया से यादवों का नाश हुआ देखकर भगवान श्रीकृष्णचंद्र इस समय सरस्वतीके जल से आचमन करके एक वृक्ष के मूल में बैठ गए । भगवान ने मुझसे प्रथम ही द्वारिका में बदरीवन जाने को कह दिया था, परंतु भगवान के अभिप्राय को जानकर भगवत् – वियोग को सहन करने में अपने असमर्थ समझकर मैं स्वामी के पीछे प्रभासक्षेत्र में गया और वहां खोजते – खोजते अपने स्वामी को देखा कि वे सरस्वती के तटपर शोभा और श्री के निकेतन अकेतन (आश्रयशून्य) अकेले ही बैठे हैं । उज्जवल श्याम शरीर शोभायमान है, दोनों लोचन प्रसन्न, अरुण वर्ण और विशाल हैं, चार भुजाएं हैं, पीताम्बर धारण किए हैं, बायीं जांघपर दाहिना चरण कमल रखे हुऐ हैं, कोमल पीपल के वृक्ष का आश्रय ले रखा है, विषय – सुख का त्यागकर पूर्णानंद – अवस्था में स्थित हैं । इस प्रकार मैंने श्रीकृष्ण चंद्र को देखा । मैं उनके सम्मुख दण्डवत् करके सिर झुकाकर बैठ गया । इतने ही में पराशर के शिष्य, व्यास जी के सुहृदय सखा मैत्रेय जी वहां आ गए ।

मुझे आनंद और भक्ति से परम अनुरक्त सिर झुकाए हुए देखकर अपनी प्रेमयुक्त मुस्कान और दृष्टि से मुझे श्रमरहित करते हुए मैत्रेय – मुनि के सामने मुकुंदभगवान इस प्रकार बोले –

श्रीभगवान – हे वसु ! मैं सबके हृदय में स्थित हूं, इसलिए तुम्हारे मन की कामना जानता हूं । मेरी प्राप्ति का उपाय एकमात्र ज्ञान है, इस ज्ञान को मेरे भक्तों के सिवा अन्य कोई नहीं जानता, वहीं ज्ञान तुमको देता हूं । तुमने पूर्वजन्म में प्रजापति और वसु के यज्ञ में मेरी आराधना की थी । यह तुम्हारा अंतिम जन्म है, इसके उपरांत मेरे अनुग्रह से तुम मुक्त हो जाओगे । यह बहुत ही उत्तम बात हुई, जो तुमने मनुष्यलोक त्यागकर मेरे परमधाम जाने के समय भक्तिपूर्वक एकांत में आकर मेरा दर्शन किया । सृष्टि के आदि में मेरे नाभि कमल पर बैठे हुए ब्रह्मा को जिस परम ज्ञान का मैंने उपदेश दिया था, वहीं ज्ञान मैं तुमको देता हूं । इस ज्ञान से मेरी महिमा प्रकट होती है और विद्वान इसको ‘भागवत’ कहते हैं ।

Supported by Astrologer Dr. Rajender Kumar

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