चले सनातन की ओर

दूसरों की सेवा ही सच्ची सेवा

दूसरों की सेवा ही सच्ची सेवा

जीवन मंत्र मानव जीवन के उत्थान व कल्याण के लिए दूसरों की सेवा ही सच्ची सेवा एवं वास्तविक साधना है। अपनी सेवा तो सभी करते हैं, लेकिन श्रेष्ठ तो उसी को माना जाता है, जो बिना किसी चाहत के नि:स्वार्थ भाव से किसी अन्य व्यक्ति की सेवा करे।
‘सुनु कपि तोहि समान उपकारी, नहिं कोई सुर नर मुनि तनुधारी’। सेवा अर्पित करने वाले की अंतर्भावना भी रामभक्त हनुमान की तरह होनी चाहिए, अर्थात ‘सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरी प्रभुताई’ ।
परम पिता परमेश्वर ने मानव जीवन देकर हमें कृतार्थ किया है। इसलिए अपने जीवन को अधिक से अधिक जन उपयोगी बनाना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इससे दूसरों के साथ-साथ स्वयं का भी कल्याण होता है। यदि हम गहन विचार करेंगे, तो पाएंगे कि पर सेवा के साथ-साथ स्वयं की सेवा भी बहुत जरूरी है। यदि कोई मनुष्य स्वयं की ही सेवा नहीं कर सकता है, तो वह किसी अन्य की सेवा कैसे कर सकता है?
यदि व्यक्ति स्वयं ही स्वस्थ नहीं है, तो दूसरों को किस तरह रोगमुक्त कर पाएगा? यदि वह स्वयं ही प्रसन्नचित्त नहीं है, तो दूसरों को किस तरह खुशी प्रदान कर पाएगा? इसी तरह यदि वह स्वयं ही दूसरों पर आश्रित है, तो किसी अन्य को किस तरह आश्रय दे पाएगा? इसलिए सबसे पहले स्व सेवा के द्वारा स्वयं को हर दृष्टिकोण से सुयोग्य बनाएं। इसके बाद जितना भी संभव हो, दूसरों का भला करें। बाकी के लिए चिंताग्रस्त होना बेकार है। ध्यान रहे कि स्वयं की सेवा में किसी अन्य का अहित लेशमात्र भी न हो। साथ ही, ख्याल रखें कि यह सेवा अपने शरीर के लिए नहीं, बल्कि ‘ईश्वर’ द्वारा प्रदान की गई ‘अनुपम भेंट’ की कर रहे हैं। वाणी व क्रोध पर संयम रखते हुए अन्य के साथ-साथ अपने जीवन को भी आनंदमय बनाएं।

Supported by Astrologer Dr. Rajender Kumar

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