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नंदी कैसे बना भगवान शिव की सवारी

नंदी कैसे बना भगवान शिव की सवारी

एक समय की बात है, शिलाद ऋषि एक आश्रम में रहते थे। उनका पुत्र भी उन्‍हीं के आश्रम में ज्ञान प्राप्‍त करता था। एक समय की बात है आश्रम में मित्र और वरुण नामक दो संत आए जिनकी सेवा का जिम्‍मा शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को सौंपा। नंदी ने पूरी श्रद्धा से दोनों संतों की सेवा की, संत जब आश्रम से जाने लगे तो उन्‍होंने शिलाद ऋषि को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया पर नंदी को नहीं।

इस बात से शिलाद ऋषि परेशान हो गए, अपनी परेशानी को उन्‍होंने संतों के आगे रखने की सोची और संतों से बात का कारण पूछा। तब संत पहले तो सोच में पड़ गए, पर थोड़ी देर बाद उन्‍होंने कहा, नंदी अल्पायु है। यह सुनकर मानो शिलाद ऋषि के पैरों तले जमीन खिसक गई, शिलाद ऋषि काफी परेशान रहने लगे।

एक दिन पिता की चिंता को देखते हुए नंदी ने उनसे पूछा, ‘क्या बात है, आप इतना परेशान क्‍यों हैं पिताजी’। शिलाद ऋषि ने कहा संतों ने कहा है कि तुम अल्पायु हो, इसीलिए मेरा मन बहुत चिंतित है। नंदी ने जब पिता की परेशानी का कारण सुना तो वह बहुत जोर से हंसने लगा और बोला, ‘भगवान शिव ने मुझे आपको दिया है। ऐसे में मेरी रक्षा करना भी उनकी ही जिम्‍मेदारी है, इसलिए आप परेशान न हों’।

नंदी पिता को शांत करके भुवन नदी के किनारे भगवान शिव की तपस्या करने लगे। दिनरात तप करने के बाद नंदी को भगवान शिव ने दर्शन दिए। शिवजी ने कहा, ‘क्‍या इच्‍छा है तुम्‍हारी वत्स’। नंदी ने कहा, ‘मैं हमेशा आपकी शरण में रहना चाहता हूं’।

नंदी से खुश होकर शिवजी ने नंदी को गले लगा लिया। शिवजी ने नंदी को बैल का चेहरा दिया और उन्हें अपने वाहन, अपना मित्र, अपने गणों में सबसे उत्‍तम रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद ही शिवजी के मंदिर के बाहर नंदी के बैल रूप को स्‍थापित किया जाने लगा।

नंदी की भक्ति से प्रसन्न हो शिवजी ने उन्हें वरदान दिया कि संसार में जहाँ कहीं भी उनका वास होगा वहां नंदी का भी वास होगा। इसीलिए शिव मंदिरों में शिव की प्रतिमा के आगे नंदी की प्रतिमा अवश्य रखी जाती है।

नंदी के दर्शन और महत्व

नंदी की दो सींगे विवेक और ज्ञान को अपनाने का विचार प्रस्तुत करती हैं, अर्थात मनुष्य को अपनी बुद्धि का प्रयोग विवेक से करना चाहिए। नंदी के कंठ में एक घंटी भी बंधी रहती है जिसकी मधुर ध्वनि भगवान में ध्यान को प्रतिस्थापित करती है।
supported by Ashtrologer  Dr. Rajender Kumar

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