चले सनातन की ओर

बद्रीनाथ धाम में आखिर क्यों नहीं बजाए जाते शंख

सनातन परंपरा में चार धाम के बहुत महत्व हैं। इनमें बद्रीनाथ जी, जगन्नाथ जी, द्वारिकाधीश जी और रामेश्वरम जी शामिल हैं। आज हम आपको बद्रीनाथ जी के बारे में एक रोचक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं। बद्रीनाथ जी में शंख बजाने पर पाबंदी है। कहते हैं कि देव असुर युद्ध के बाद से यहां शंख बजाना वर्जित हो गया। तो आखिर एेसा क्या कारण था जो बद्रीनाथ में शंख बजाना बंद हो गया।
मान्यता है कि एक बार उत्तराखंड के सिल्ला गांव में दानव सातापी और बातापी का आतंक था। यह दोनों असुर भाई किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को होने नहीं देते थे। ऋषि मुनियों को कर्मकांड करते ही अपना निवाला बना लेते थे। इनका इतना आतंक था कि कोई भी साधक प्रभू की आराधना नहीं कर सकता था। इसी क्षेत्र में साणेश्वर महाराज का मंदिर भी था। यहां वह भगवान की स्तुति करते थे। मगर इन दोनों राक्षसों को उनके बारे में पता लग गया।
फिर दोनों ने साणेश्वर महाराज के मंदिर में भी हमला बोल दिया। सभी साधू भागने लगे। साणेश्वर महाराज के भाई थे अगस्त मुनि। जब साणेश्वर महाराज से हालात काबू नहीं हुए तो उन्होंने अगस्त मुनि से सहायता मांगी। इस पर अगस्त मुनि उनकी सहायता के लिए आए। मगर दोनों असुर इतने बलशाली थे कि अगस्त मुनि भी उनको देख सहम गए। अब इन दोनों से बचना लगभग नामुमकिन हो गया था।
एेसे में अगस्त मुनि ने अपनी योग बल से कुष्मांडा माता का जन्म किया। माता के विशाल रूप देख दोनों राक्षस भागने लगे। कहते हैं आतापी तो मंदाकनी नदी में छिप गया। बातापी को कहीं रास्ता ना मिला तो उसने बद्रीनाथ मंदिर में रखे शंख में खुद को छुपा लिया। बस तब से ही यहां शंख नहीं बजाया जाता।
इसके अलावा वैज्ञानिक तर्क यह है कि शंख की ध्वनि से कंपन होती है। बद्रीनाथ मंदिर के उपर कई बड़े बड़े हिमखंड रहते हैं अगर शंख बजाया गया तो शंख की ध्वनि पहाड़ों से टकरा कर ईको (प्रतिध्वनि) पैदा करती है। इससे बर्फ में क्रैक्स पडऩे या बर्फीले तूफान की आशंका प्रबल हो सकती है। इसके अलावा भू—क्षरण का भी खतरा हो सकता है। इसी लिहाज से शायद धाम में शंख बजाया जाना प्रतिबंधित किया गया हो।

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