चले सनातन की ओर

श्रीरामचरितमानस (लंकाकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस (लंकाकाण्ड)
⬇⬇⬇⬇अग्निपरीक्षा का वर्णन ⬇⬇⬇

कह रघुबीर कहा मम पासा। चले सकल मन परम हुलासा।।
देखहुं कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं।।

सुन प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे।
सीता प्रथम अनल महुं राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी।।

तेहि कारन करुणानिधि कहे कछुक दुर्बाद।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद।।

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी।।

सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम नीति सानी।
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकल न ओऊ।।

देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए।।
पावक प्रबल देखि बैदेही। ह्दयं हरष नहिं भय कछु तेही।।

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं।।
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुं होउ श्रीखंड समाना।।

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।।
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहुं कनक पंकज की कली।।

supported by Astrologer Dr. Rajender Kumar

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