चले सनातन की ओर

साथ छूटे तो समझो वक़्त आ गया

बोकोजू झेन फकीर हुआ; वह जब अपने गुरु के पास था, छोटा बच्चा था, उसका काम था गुरु का कमरा साफ करना। कमरा साफ कर रहा था कि गुरु के पास एक बड़ी बहुमूल्य मूर्ति थी, बुद्ध की, वह गिर गई। वह चकनाचूर हो गई। वह बहुत घबड़ाया।

गुरु को उस मूर्ति से बड़ा लगाव है। वह रोज दो फूल उस मूर्ति के चरणों में चढ़ा जाता है। और सदियों पुरानी मूर्ति है। गुरु के गुरु के पास थी, और उनके भी गुरु के गुरु के पास थी। और पीढ़ी दर पीढ़ी वसीयत की तरह मिली है।
यह क्या हो गया?

वह घबड़ा ही रहा था कि तभी गुरु कमरे में आ गया। तो उसने मूर्ति अपने दोनों हाथों के पीछे छिपा ली और उसने गुरु से कहा, एक बात पूछनी है—- जब कोई आदमी मरता है तो क्यों मरता है? तो उसके गुरु ने कहा—उसका समय आ गया। तो उसने कहा कि यह आपकी मूर्ति का समय आ गया था।

गुरु हंसा और उसने कहा, जो तू मुझे समझा रहा है, अपने जीवन में याद रखना। क्योंकि तेरे जीवन में बहुत मूर्तियों का समय आएगा। जब टूटे तो याद रखना, समय आ गया था।

और बोकोजू कहता है, वही बात उसके जीवन को बदलनेवाली बन गई।

जो चीज टूट गई, उसने सोचा, समय आ गया था।
जो साथी छूट गए। उसने सोचा, समय आ गया था।
जो प्रियजन चल बसे, उसने सोचा, समय आ गया था। कोई नाराज हो गया तो उसने समझा, समय आ गया था।

बोकोजू ने कहा कि यह बात मेरे लिए सूत्र बन गई। यह अहर्निश मेरे मन में रहने लगा कि वही होता है, जिसका समय आ गया था। धीरे-धीरे-धीरे कोई भी चीज फिर शोकाकुल न करती।

ओशो

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